वंदे मातरम्! मित्रो!एक युगबोध 'गीतिका' में समर्पित है।
रिश्तों की बस्ती को हम,बाजार नहीं करते।
चेहरे पर चेहरों का,कारोबार नहीं करते।
जो करना है,प्रेम,अदावत,खुलकर हम करते,
छिपे भेड़ियों-सा पीछे से,वार नहीं करते।
नहीं ठिकाना,उसका कि कब कहाँ मुकर जाए,
चलती साँसों पर हम,यूँ एतबार नहीं करते।
जो मन से सुंदर हैं,जिनका हृदय सदा सुरभित उपवन,
चेहरे का वे कभी असत् ,शृंगार नहीं करते।
नवरत्नों में शामिल अब तक, नहीं रहे क्योंकि,
दरबारों में रहकर भी,दरबार नहीं करते।
डॉ मनोज कुमार सिंह
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