वंदे मातरम्!मित्रो!एक ताजा गजल हाजिर है।
चलकर देखना,बेहतर सफर है।
दिल के भीतर भी इक,अद्भुत शहर है।
कहाँ सुख ढूढ़ने,जाते हो बाहर,
भरा तुझमें ही जब,खुशियों का घर है।
नदी को चूम लेती,जब हवाएँ,
उमंगों से उमगती,हर लहर है।
पखेरु मन भटकता,जा रहा है,
न जाने किस दिशा में,अग्रसर है।
गुनाहों को छिपा लो,लाख लेकिन,
खुदा हर साँस पर,रखता नजर है।
भला क्या खाक,समझेगा जहां को,
जो खुद की जिंदगी से,बेखबर है।
डॉ मनोज कुमार सिंह
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