वन्दे भारतमातरम्!मित्रो!आज आपके लिए एक ताजा समसामयिक गजल समर्पित कर रहा हूँ। स्नेह सादर अपेक्षित है।
धुआँ धुआँ-सा ,मंजर आज दिखता है।
आँख खुलते हीं ,जंगलराज दिखता है।
कैसे निकलेगी अपने ,घोसले से गौरैया,
कदम-कदम पे ,हिंसक बाज दिखता है।
छूरा बंदरो के हाथ ,देकर रो रहे क्यों,
यहीं होना था निश्चित ,जो आज दिखता है।
छिनैती,अपहरण,हत्या,वसूली के लिए अब,
दुशासन-सा सुशासन का,अंदाज दिखता है।
उस अदालत में फ़रियाद से क्या फायदा,
जहाँ कातिल के सिर पे ,ताज दिखता है।
डॉ मनोज कुमार सिंह
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