Tuesday, August 25, 2015

कविता(माँ मोम है)

वन्दे भारतमातरम्!मित्रो!आज एक छोटी सी कविता आपको समर्पित कर रहा हूँ। स्नेह दीजिएगा।

माँ मोम है
पिता उसमें पिरोया
जलता हुआ धागा है
जिसके ताप से
पिघलती रहती है माँ
और
जिसकी रोशनी में
बच्चे पढ़ते रहते हैं
पिघलने और जलने का
स्निग्ध व्याकरण पल-पल।
साथ ही
तय करते रहते हैं
अपनी जिंदगी की दिशा ।

डॉ मनोज कुमार सिंह

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